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व्यंग्य

साहब हम कबीर के वंशज हैं  / कीर्ति काले

जी हाँ ।हम तुलसी,सूर कबीरा के वंशज हैं। हमारे पूर्वज इतने महान थे कि वर्षों बाद भी तुलसी के मानस को घर घर में गाया जाता है।कबीर के दोहे बात बात की बोलचाल में उद्धृत किए जाते हैं। मीरा बाई मेरे तो गिरिधर गोपाल गाकर अमर हो गईं। सूरदास जी तो नेत्रहीन थे फिर भी कृष्ण लीला को अपने पदों में जीवन्त पर दिया । लोगों से सुना है कि ये सभी पढ़े लिखे नहीं थे(जबकि सत्य ये है कि इन सभी ने गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की थी)अचानक इन्हें ब्रह्म ज्ञान हुआ, जादू की छड़ी ऐसी घूमी कि इनका कायापलट हो गया।हम भी कवि हैं। इतने महान पूर्वजों के वंशज हैं इसलिए हमें भी पढ़ने से क्या लेना-देना।पत्र पत्रिकाओं को हम दूर से प्रणाम करते हैं। इसीलिए दूरदर्शन पर दिखते हैं। हम पढ़ते इसलिए नहीं हैं कि कहीं किसी की छाप हमारे लेखन पर न आ जाए।हम तो जन्मजात कवि हैं। पढ़ने से हमारा क्या वास्ता।हम तो डायरेक्ट मंच पर पढ़ते हैं।कभी गीत ग़ज़ल मुक्तक तो कभी नज़्म।अपनी मौज में लिखते हैं।अब वो दोहा है,शेर है,घनाक्षरी है, सवैया है,गीत है या गज़ल ये हमें नहीं पता।हमारा काम तो लिखना है। हमारे लिखे हुए को सोशल मीडिया पर हजारों लाइक्स मिलते हैं। हमारी वीडियो हाथों हाथ वाईरल होती है।हम लीक से हटकर चलते हैं। और तो और अब तो फ्रीवर्स का जमाना है।जो कुछ भी नहीं है वो फ्रीवर्स है। किसी कवि सम्मेलन में हमने सुना था कि

लीक छांडि तीनों चले
सायर सिंह सपूत।

ये लाइनें किसकी हैं ये नहीं मालूम लेकिन जिसकी भी हैं बहुत कमाल की हैं।हम तो शायर भी हैं, सिंह भी हैं और सपूत भी हैं। फिर हमें तो लीक छोड़नी ही पड़ेगी।

एक नवोदित कवि ने मुझे बताया कि 
मैं तहत में तो ठीक से लिख लेता हूँ लेकिन
तरन्नुम में नहीं लिख पाता। मुझे कुछ तरीका बताईए जिससे मैं तरन्नुम में भी लिख पाऊं।क्योंकि तरन्नुम वालों को ज्यादा वाहवाही मिलती है। मैं उस नवोदित की जेन्यून समस्या सुनकर हतप्रभ रह गयी। कविता को इस दृष्टिकोण से तो मैंने देखा ही नहीं था।तहत में लिखना और तरन्नुम में लिखना अलग-अलग होता है ये उस परमज्ञानी नवोदित से ही पता चला।
एक कवि सम्मेलन में एक सुन्दर सी षोड़षी कवयित्री बोली कि मैंने बिल्कुल नयी धुन में मुक्तक लिखे हैं पहली बार मंच से पढ़ रही हूँ।आप आशीर्वाद देंगे तो आगे भी पढ़ूंगी नहीं तो यहीं फाड़कर फैक दूंगी।वो मुक्तक वास्तव में मुक्तक ही थे।मुक्तक की प्रत्येक पंक्ति कथ्य ,मीटर और तुकान्तों से सर्वथा मुक्त थी। जिसे वो नयी धुन कह रही थी वो बरसों पुरानी भजनों की धुन थी। आजकल वो कवयित्री नवोदित नहीं अन्तर्राष्ट्रीय हो चुकी है। लेकिन मुक्तक आज भी वो कथ्य,शिल्प से सर्वथा मुक्त ही सुनाती है।
हम कबीर के वंशज हैं इसलिए हमें कुछ भी कहने का अधिकार है।माइक पर आते ही हमारी सुप्त चेतना अतिरिक्त रूप से जाग्रत हो जाती है। 
हम कवि हैं इसलिए किसी को भी गाली देने की हमें छूट है।
हम कवि हैं इसलिए किसी का भी चरित्र हनन करना हमारा अधिकार है।हम कवि हैं इसलिए हमारे देवी देवताओं का मजाक उड़ाना हमारे लिए क्षमा है। अश्लील नोंक-झोंक करना, निम्न स्तरीय टिप्पणियाँ करना, श्रोताओं में बैठे बुजुर्गो, महिलाओं पर भौंडे कमेंट्स करना हमारी परफॉर्मेंस का पार्ट है। हम कवि हैं इसलिए हम कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं।

साहब हम कबीर के वंशज हैं।

क्षमा सहित

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डॉ कीर्ति काले

Kirti_Kale@yahoo.com