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कविता

पार वाली झोंपड़ी से गांव का व्यवहार क्या हो ? / राकेश खंडेलवाल

प्रश्न तो कर लूं
मगर फिर प्रश्न उठता है
कि मेरे प्रश्न का आधार क्या हो
पार वाली झोंपड़ी से गांव का व्यवहार क्या हो ?

भावना के दायरे में जो सिमट बैठीं अचानक
दूरियों के मापने का कौन सा प्रतिमान मानें
अजनबियत की गहन गहरी बिछी इन घाटियों में
पार जाने का सही है कौन सा पथ आज जानें
व्योम से लेकर धरा तक, स्वप्न के सेतु बनाकर
चल रहे जो खींच कर हम आस के खाके सुनहरी
उन पथों पर भोर कर लें या कि संध्या कोई बोले
क्या भरें आलाप, छेड़ें बाँसुरी की याकि तानें

छिन्न मस्ता आस्था ने सौंप रखे ज़िन्दगी को
दर्द के बोझिल पलों का आखिरी उपचार क्या हो ?

टूटते अनुबंध की कड़ियाँ पिरोते रात बीती
शेष जो सौगंध के मानी रहे वो हाशियों पर
बीज बो नित जो उगाईं चाहतों के रश्मिरथ पर
किस गगन के जलद चल कर आ सकेंगे रास्तों पर
चल रहे जिन उंगलियों को थाम कर हम इस सफ़र में
है सुनिश्चित क्या, कि मंज़िल तक हमारा साथ देंगी
छटपटातीं ताकतीं सुधियाँ दिशाओं के झरोखे
नाम किसका लिख सकेगा बिन पते की पातियों पर

ज़िन्दगी के मंच पर बिखरीं हजारों पटकथायें
कशमकश है इन सभी का एक उपसंहार क्या हो ?

हो गई विस्मॄत शपथ जो अग्नि के सन्मुख उठी थीं
हमकदम सब राह के थक दूर पीछे रह गये हैं
क्षुद्र टुकड़ों में बंटी है संस्कॄतियों की धरोहर
श्वास के अवलंब सारे आंधियों में बह गये हैं
मान कर जिन पत्थरों को देवता पूजा किये हम
प्राण उनमें क्या कभी कोई पुजारी पा सकेगा
कल्पना के इन्द्रधनुषों को तलाशें सात अंबर
रंग थे जिनमें बसे, वे महल सारे ढह गये हैं

रूठ कर बैठे पलों को ज़िन्दगी के जो मना ले
प्रश्न लेकर घूमता हूँ एक वो मनुहार क्या हो ?

पार वाली झोंपड़ी से गांव का व्यवहार क्या हो.

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राकेश खंडेलवाल