लघु कथा अमरीका में हिंदी

लघु कथा

भेड़िए / प्रियंका गुप्ता

माँ अक्सर अपने नन्हे-से मेमने को समझाती, घर के दूर तक अकेले न जाना| गहना अँधेरा, बिलकुल काला जंगल जिसमें खूँखार जंगली जानवर बसते हैं| बाकी तो सब ठीक है, शायद बख्श भी दें | पर भेड़िया तो जीव है, जिससे उसे सबसे ज़्यादा होशियार रहना है| अपनी आँख-नाक सब खुले रखने हैं| माँ जब काम पर जाए तो दरवाज़ा बंद करके घर के अंदर ही रहना है| मेहमान का भी भरोसा नहीं करना है बिलकुल| दूर से भी कभी भेड़िए के छुपे होने का डर हो तो भागकर, घर में घुस कर दरवाज़े-खिड़कियाँ बंद कर लेने हैं|

माँ ने दुनिया देखी थी, जंगल देखा था, वो सब जानती थी| मेमना भी माँ की सब बात मानता था| यह बात भी मान ली| इसलिए अभी तक कहीं नहीं जाता था| किसी अजनबी तो दूर, जानने वाले से भी ज़्यादा बात नहीं करता था| माँ के जाते ही घर के सब खिड़की दरवाज़े बंद कर लेता था|

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प्रियंका गुप्ता

एक दिन जब माँ काम से लौटी, मेमना कहीं नहीं मिला| मिले तो बस कुछ खून के कतरे| माँ नहीं समझ पा रही थी कि उसके इतने आज्ञाकारी बच्चे का शिकार कैसे हुआ| शिकार होने तक मेमना भी नहीं समझ पाया होगा| माँ उसे घर के भेड़िए के बारे में बताना जो भूल गई थी|